“भटकना भी एक खोज है”

आज सुबह एक सवाल मन में आया—
क्या सच में हम इस दुनिया में
अपनी जगह ढूँढ रहे हैं?
या फिर…
हम बस उन जगहों में फिट होने की कोशिश कर रहे हैं
जो दुनिया ने पहले से तय कर रखी हैं?
सफलता के इतने टेम्पलेट बना दिए गए हैं—
अच्छी नौकरी,
बड़ा घर,
पहचान,
और एक तयशुदा रास्ता।
और अगर इनमें से कुछ भी
हमारे हिस्से में न आए
तो हम खुद को असफल समझने लगते हैं।
पर आज एक अजीब-सी बात समझ आई—
हो सकता है
हम किसी बने-बनाए साँचे में फिट होने के लिए बने ही न हों।
हो सकता है
हमारी असली जगह
किसी टेम्पलेट में नहीं लिखी हो।
क्योंकि जिस चीज़ के लिए हम बने हैं
वह भी तो हमें ढूँढ रही होती है।
शायद इसलिए
कभी-कभी रास्ते देर से मिलते हैं।
शायद इसलिए
कभी-कभी हम भटकते हैं।
पर यह भटकना भी
एक तरह की खोज ही है।
अजीब-सी जंग है—
हम अपनी जगह खोज रहे हैं
और हमारी जगह हमें।
कभी हम उसे पहचान नहीं पाते,
कभी वह हमें पहचानने में देर कर देती है।
पर शायद जीवन का रहस्य यही है—
जब सही समय आता है
तो दोनों एक-दूसरे को
पहचान लेते हैं।
और तब अचानक लगता है—
हम भटके नहीं थे…
हम बस
अपने रास्ते तक पहुँच रहे थे।
शुभ प्रभात।
हनुमानगढ़ की शांत सुबह से।
— Rakesh Karwasra
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Bahut hi pyara likha hai sir thank you padkar bahut achha laga.