सुबह की पहली किरण के साथ आँख खुली तो मन ने तुरंत सवाल किया— “राकेश, कल वाले काम अधूरे पड़े हैं, आज भी वही रूटीन? क्या तू सच में आगे बढ़ रहा है?”

मैंने चुपचाप जवाब दिया: “हाँ, बढ़ रहा हूँ… बस कभी-कभी रफ्तार धीमी हो जाती है। लेकिन रुकता नहीं।”
आज शनिवार है। हफ्ते का आखिरी कामकाजी दिन, लेकिन दिल कह रहा है—आराम भी जरूरी है। पिछले दिनों की थकान, छोटी-छोटी चिंताएँ, और भविष्य की अनिश्चितताएँ… सब एक साथ घूम रहे थे।
फिर खुद से बात की: “जो हो गया, उसे छोड़ दो। जो करना है, उसे प्राथमिकता दो। और सबसे महत्वपूर्ण—खुद को इतना समय दो कि तू हँस सके, साँस ले सके, और महसूस कर सके कि तू जी रहा है, सिर्फ़ भाग नहीं रहा।”
आज का छोटा सा संकल्प:
- एक काम पूरा करो जो लंबे समय से टला हुआ है।
- खुद को कम से कम 30 मिनट की साइलेंस दो—बिना फोन, बिना डिस्ट्रैक्शन।
- और खुद से कहो: “तू काफी अच्छा कर रहा है। बस थोड़ा और धैर्य रख।”
क्योंकि जीवन दौड़ नहीं, यात्रा है। और इस यात्रा में सबसे अच्छा साथी खुद हम ही होते हैं।
आज तुमने खुद से क्या कहा? “मैं ठीक हूँ” या “मैं और बेहतर हो सकता हूँ”?
बोलो न… आज तो मन की बात मन ही सुन ले। 🌿
—Rakesh Karwasra
लाजवाब