रविवार: खुद के नाम | 1 फरवरी, 2026 प्रिय मैं, आज रविवार है। वो दिन जब दुनिया थोड़ी धीमी चलती है, और तुम्हें खुद से मिलने का वक्त मिलता है। मगर कितनी बार तुम इस वक्त को भी भागते हुए गुज़ार देते हो? कितनी बार तुम खुद से मिलने से कतराते हो? मैं जानता हूँ…
Category: रविवार: खुद के नाम
यह कॉलम दूसरों के लिए नहीं,
खुद से धीरे-धीरे बात करने के लिए है।
यहाँ उपदेश नहीं होते,
यहाँ अपने मन की थकान, सुकून
और छोटी-छोटी खुशियाँ
शब्दों का रूप लेती हैं।
Happiness Essay Series | Essay 01
Happiness Essay Series | Essay 01 रविवार कोई साधारण दिन नहीं होता।वह समय नहीं, संवेदना होता है।एक ऐसा विराम,जहाँ घड़ी की सुइयाँ चलती तो हैं,पर मन उन पर ध्यान नहीं देता। आज इस ठहरे हुए दिन मेंमैंने खुद से एक पुराना प्रश्ननए ढंग से पूछा—खुशी आखिर है क्या? बहुत बार हम खुशी कोकिसी परिणाम से…