
रिश्तों की शुरुआत अक्सर शब्दों से होती है,
लेकिन उनका सबसे गहरा हिस्सा चुप्पियों में पलता है।
वह चुप्पी जो पहली नज़र में शांत लगती है,
पर भीतर बहुत कुछ कह रही होती है।
समय के साथ रिश्तों में बातें कम नहीं होतीं,
बस कही जाने वाली बातें बदल जाती हैं।
हम वही कहते हैं जो ज़रूरी लगता है,
और जो ज़रूरी नहीं दिखता,
उसे टालते चले जाते हैं।
यहीं से दूरी जन्म लेती है —
धीरे, बिना आवाज़ किए।
कई बार रिश्तों में चुप्पी नाराज़गी नहीं होती,
वह थकान होती है।
बार-बार समझाने की,
बार-बार खुद को सही साबित करने की,
और हर बार वही न समझे जाने की थकान।
ऐसी चुप्पी में इंसान अकेला नहीं होता,
पर खुद को अकेला महसूस करने लगता है।
रिश्तों की सबसे कठिन भाषा
वही होती है जिसे शब्दों में नहीं बदला जा सकता।
जब सामने वाला पूछता है —
“सब ठीक है?”
और जवाब आता है —
“हाँ”
लेकिन उस “हाँ” में
कुछ भी ठीक नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक रूप से देखें तो
रिश्तों की दूरी अक्सर
किसी बड़ी घटना से नहीं,
छोटी-छोटी अनसुनी भावनाओं से बनती है।
जो बात समय पर कही जा सकती थी,
अगर वह दबा दी जाए,
तो वही आगे चलकर दीवार बन जाती है।
समझ रिश्तों का सबसे शांत आधार है,
और शायद सबसे दुर्लभ भी।
हम अक्सर चाहते हैं कि सामने वाला हमें समझे,
पर यह भूल जाते हैं
कि समझने के लिए
पहले सुनना पड़ता है।
सिर्फ शब्दों को नहीं,
उनके पीछे छुपी चुप्पी को भी।
हर रिश्ता रोज़ बातचीत नहीं माँगता,
लेकिन ईमानदार जगह ज़रूर चाहता है।
जहाँ इंसान यह कह सके —
“मैं ठीक नहीं हूँ,”
बिना यह डर महसूस किए
कि उसे कमज़ोर समझ लिया जाएगा।
रिश्तों को बचाने के लिए
हर बार बोलना ज़रूरी नहीं,
पर हर बार चुप रहना भी सही नहीं।
कभी-कभी एक सच्ची बात
कई दिनों की ख़ामोशी से
ज़्यादा रिश्तों को थाम लेती है।
लेखक की बात
यह लेख किसी रिश्ते को परिभाषित नहीं करता,
बस यह याद दिलाता है
कि रिश्ते शब्दों से नहीं,
समझ से टिकते हैं।
— राकेश कड़वासरा
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Sahi likha rakesh bhai aapne