
सुबह की चाय ठंडी हो रही थी, और मन ने अचानक कहा: “कल तूने कहा था – ‘मैं सच हूँ, और यही काफी है’… आज भी वही फील हो रहा है?”
मैंने कप थामा और बोला: “नहीं। आज थोड़ा अलग है। कल मैंने खुद को ‘काफी’ माना था। आज मैं खुद से पूछ रहा हूँ – ‘काफी’ का मतलब क्या है? क्या सिर्फ़ जीवित होना काफी है? या कुछ और भी चाहिए – जैसे थोड़ी सी शांति, थोड़ी सी दिशा, थोड़ी सी हिम्मत?”
मन चुप रहा। फिर धीरे से बोला: “तू कल वाली थाली की बात कर रहा था ना? आज थाली में क्या है?”
मैंने देखा। थाली में:
- एक अधूरी नींद
- एक पुरानी चिंता जो अभी भी किनारे पर बैठी है
- एक छोटी सी उम्मीद जो कल से बची हुई है
- और चाय का आखिरी घूँट, जो अब ठंडा हो चुका है
तो मैंने खुद से कहा: “ठीक है। आज मैं इन सबको स्वीकार कर लूँगा। अधूरी नींद को कहूँगा – ‘तू भी मेरी है’ चिंता को कहूँगा – ‘तू भी मेरी है, पर तू बॉस नहीं’ उम्मीद को कहूँगा – ‘तू छोटी है, पर तू सबसे कीमती है’ और ठंडी चाय को… पी लूँगा। क्योंकि ये भी मेरी है।”
आज का संकल्प छोटा सा है:
- मैं आज खुद को जज नहीं करूँगा।
- मैं बस देखूँगा – जैसा है, वैसा।
- और अगर कुछ बदलना होगा, तो धीरे-धीरे, बिना जल्दबाजी के।
क्योंकि जीवन कोई परीक्षा नहीं है जहाँ हर रोज़ 100/100 लाना जरूरी हो। ये एक लंबी सैर है, जहाँ कभी-कभी रुकना, चाय ठंडी होने देना, और फिर चल पड़ना भी ठीक है।
आज का एक सवाल खुद से: “अगर आज की थाली में सिर्फ़ ठंडी चाय और एक छोटी उम्मीद ही बची है… तो क्या तू फिर भी कहेगा – ‘मैं ठीक हूँ’?”
मेरा जवाब आज: हाँ। क्योंकि ठंडी चाय भी चाय है। और छोटी उम्मीद भी उम्मीद है।
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की हल्की ठंडी और साफ़ सुबह से। ☕🌾 खुद की थाली को देखो। और मुस्कुरा दो। बस इतना काफी है।
-Rakesh Karwasra
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