
सुबह की पहली किरण ने खिड़की पर हाथ फेरा, धुंध अभी भी हल्की-हल्की बिछी हुई थी। चाय का कटोरा हाथ में आया—गर्म, लेकिन बहुत धीरे से ठंडा होने को तैयार। मन ने आज कोई सवाल नहीं उठाया। बस एक लंबी, गहरी साँस ली।
मैं खिड़की के पास खड़ा रहा, हनुमानगढ़ की सुबह को देखता रहा— खेतों पर धुंध का पतला दुपट्टा, दूर किसी ने गीत गाया, आवाज़ धुंध में घुलकर मेरे पास आई। और लगा… कभी-कभी जवाब सवाल से पहले आ जाता है। कभी-कभी चुप्पी पहले बोल लेती है।
मैंने खुद से कहा (बिना शब्दों के, बस मन में): “आज मैं सवाल मत पूछूँगा। आज मैं बस रहूँगा। रहने दूँगा धुंध को, रहने दूँगा ठंडक को, रहने दूँगा इस पल को। क्योंकि जीवन कोई ड्राफ्ट नहीं है— यह एक बार का गीत है, जिसे बार-बार गाना नहीं पड़ता। बस सुनना पड़ता है।”
मन ने आज विरोध नहीं किया। बस मेरे कंधे पर सिर टिका दिया— जैसे थक गया हो, जैसे कह रहा हो: “आज बस यही काफी है।”
आज का संकल्प: पाँच मिनट के लिए सब छोड़ दूँगा। न सोचूँगा, न चाहूँगा, न दौड़ूँगा। बस खड़ा रहूँगा— चाय ठंडी होने दूँगा, धुंध उठने दूँगा, और खुद को होने दूँगा।
आज का एक सवाल (खुद से, बहुत धीमे से): अगर आज सवाल न पूछूँ, तो क्या मैं अधूरा हो जाऊँगा… या पूरा हो जाऊँगा?
मेरा जवाब: आज मैं पूरा हूँ। क्योंकि मैंने सवाल को भी आराम करने दिया।
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की धुंध से सनी, चुप्पी से भरी सुबह से। ☁️🤍 आज थोड़ा सा “बस होना” आज़माओ। वो बहुत गहरा लगेगा।
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