“अपनी कहानी का नायक”

आज एक अजीब-सी बात समझ आई—
हममें से बहुत से लोग
अपनी ज़िंदगी नहीं जी रहे होते,
हम बस दूसरों की कहानियाँ पढ़ रहे होते हैं।
किसी की सफलता में
अपना अधूरापन खोजते हैं,
किसी की चमक में
अपनी कमी।
धीरे-धीरे ऐसा होता है
कि हम अपनी ही ज़िंदगी के
दर्शक बन जाते हैं।
हम देखते रहते हैं
कि कौन कहाँ पहुँच गया,
किसकी कहानी कितनी बड़ी है।
और इसी बीच
हमारी अपनी कहानी
चुपचाप आगे बढ़ती रहती है।
शायद जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है—
हम अपने जीवन के मंच पर खड़े होते हैं,
लेकिन संवाद
किसी और के लिखे हुए बोलते रहते हैं।
जब तक हम
दूसरों की कहानी में
अपनी कहानी ढूँढते रहेंगे,
तब तक हम
अपनी कहानी के
नायक नहीं बन पाएँगे।
क्योंकि नायक वह नहीं होता
जो सबसे बड़ा दिखे—
नायक वह होता है
जो अपनी कहानी
खुद लिखने का साहस रखे।
और शायद जीवन का असली मोड़
तभी आता है
जब हम पहली बार
दूसरों की किताब बंद करके
अपनी कहानी लिखना शुरू करते हैं।
— Rakesh Karwasra