“भटकने का भी एक अर्थ होता है।“

कभी-कभी जीवन में
हम अचानक रुककर सोचते हैं—
क्या हम सही रास्ते पर हैं?
यह सवाल अक्सर तब पैदा होता है
जब भीतर कहीं हल्की-सी बेचैनी होती है,
जब सब कुछ ठीक होते हुए भी
कुछ अधूरा-सा महसूस होता है।
और कई बार
धीरे-धीरे यह एहसास भी होने लगता है
कि शायद हम
कहीं भटक गए हैं।
पर जीवन की एक अजीब-सी सच्चाई है—
यह जानने के लिए भी
कि हम रास्ता भटक गए हैं,
हमें कुछ दूर चलना पड़ता है।
अगर हम चलते ही नहीं,
अगर हम रास्तों पर कदम ही नहीं रखते,
तो शायद हमें
कभी पता ही न चलता
कि कौन-सा रास्ता हमारा था
और कौन-सा नहीं।
भटकना हमेशा गलती नहीं होता।
कई बार वही
हमारी समझ को गहरा करता है,
हमारी दृष्टि को विस्तृत करता है।
क्योंकि जीवन के रास्ते
हमेशा नक्शों से नहीं मिलते।
वे अनुभवों से मिलते हैं,
ठोकरों से मिलते हैं,
और कई बार
भटक जाने की पीड़ा से मिलते हैं।
कभी-कभी
भटकना ही वह प्रक्रिया होती है
जिससे हम समझते हैं
कि हमें सच में कहाँ पहुँचना है।
आज मैंने खुद से कहा—
अगर कभी लगे
कि रास्ता गलत है,
तो रुककर खुद को दोष मत देना,
डरना भी मत।
क्योंकि शायद
यह एहसास ही
उस जागरण की शुरुआत है
जो तुम्हें उस रास्ते तक ले जाएगा
जो सच में तुम्हारा है।
और शायद
जीवन की सबसे सच्ची यात्राएँ
सीधे रास्तों से नहीं,
भटके हुए कदमों से शुरू होती हैं।
— Rakesh Karwasra