
कभी सोचा है तुमने…
कि तुम जो आज हो,
क्या सच में वही हो…
जो कभी थे?
या बस…
वक़्त ने तुम्हें
थोड़ा-थोड़ा बदलते-बदलते
किसी और में ढाल दिया?
मैं कोशिश करता हूँ—
लौटने की…
उसी पुराने “मैं” तक,
जहाँ हँसी बिना वजह आती थी,
जहाँ नींद में भी सपने मुस्कुराते थे।
पर अजीब है न…
रास्ते तो याद हैं,
मोड़ भी याद हैं,
पर वो “मैं”—
जिसे ढूँढने निकला हूँ,
कहीं मिलता ही नहीं।
आईने में खड़ा ये शख्स
मुझे देखता तो है…
पर पहचानता नहीं।
और तब समझ आता है—
खोना हमेशा किसी और को नहीं होता,
कभी-कभी
हम खुद से भी बिछड़ जाते हैं।
मैं हो तो जाऊँ पहले जैसा…
सच में चाहता हूँ—
पर कैसे बनूँ?
जब मुझे याद ही नहीं…
कि मैं था कैसा।
-Rakesh Karwasra