विचार: हम कहीं नहीं जाते… बस खुद तक लौटते हैं
सुबह उठा तो खिड़की से हल्की धूप आई।
न ज्यादा तेज़, न जलाने वाली।
बस इतनी कि कमरे में एक सुनहरा कोना बन जाए।
चाय बनाई।
कटोरा हाथ में लिया।
खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा।
और मन में एक पुरानी बात फिर से उठी—
“हम कहीं नहीं जाते…
बस खुद तक लौटते हैं।”
मैंने कटोरा मेज़ पर रख दिया।
आँखें बंद कीं।
सिर्फ़ साँस ली।
और सोचा—
कितने साल हो गए…
कितने शहर देखे,
कितने रास्ते तय किए,
कितनी ऊँचाइयाँ छुईं,
पर हर बार जब थककर रुकता हूँ,
तो पाता हूँ कि मैं वही हूँ—
वही छोटा-सा बच्चा जो कभी पेड़ के नीचे बैठकर बादलों को देखता था।
वही सवाल पूछता था—
“मैं कौन हूँ?”
और आज पहली बार खुद से बोला—
“विनय…
तू कहीं नहीं गया।
तू बस घूमकर लौट रहा है।
हर नौकरी, हर रिश्ता, हर सफलता, हर असफलता—
सब यात्रा के पड़ाव थे।
पर मंज़िल तू ही था।
हमेशा से तू ही था।”
मैंने आँखें खोलीं।
धूप अब और चमक रही थी।
और लगा—
जो हम बाहर ढूँढते हैं,
वो अंदर पहले से मौजूद होता है।
जो हम पाने जाते हैं,
वो हम खोकर ही पाते हैं।
और जो हम बनने की कोशिश करते हैं,
वो हम छोड़कर ही बन पाते हैं।
आज मैंने कोई नया लक्ष्य नहीं बनाया।
कोई नई दिशा नहीं चुनी।
बस एक छोटा-सा वादा किया—
“अब से जब भी लगे कि मैं कहीं जा रहा हूँ,
तो रुक जाऊँगा।
एक गहरी साँस लूँगा।
और खुद से पूछूँगा—
‘क्या तू सच में कहीं जा रहा है…
या बस खुद तक लौट रहा है?’”
शायद यही सबसे बड़ी यात्रा है—
खुद से भागना और फिर खुद तक लौट आना।
बार-बार।
हर बार थोड़ा और साफ़।
हर बार थोड़ा और अपना।
शुभ प्रभात।
हनुमानगढ़ की इस साफ़, सुनहरी और बहुत घर जैसी सुबह से।
आज बस इतना ही।
और यही बहुत है।
क्योंकि हम कहीं नहीं जाते।
हम बस खुद तक लौटते हैं।
और लौटते-लौटते…
शायद पहली बार खुद को सच में देख पाते हैं।
-rakesh Karwasra