सुबह उठा तो खिड़की पर बारिश की बूँदें टकरा रही थीं। धीरे-धीरे। एक-एक करके। जैसे कोई पुरानी बातें धीरे-धीरे याद आ रही हों।

चाय बनाई। कटोरा हाथ में लिया। गर्माहट उँगलियों में फैली। पर मन बाहर की ठंड में कहीं और था।
बूँदें गिरती रहीं। कभी तेज़, कभी हल्की। कभी छत पर, कभी शीशे पर। और हर बूँद के साथ लगा— ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है।
कभी तेज़ बारिश की तरह सब कुछ बहा ले जाती है। कभी बूँद-बूँद टपकती है— धीरे-धीरे, चुपचाप, पर हर बूँद में एक कहानी छिपी होती है।
मैंने कटोरा मेज़ पर रखा। खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर देखा। पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं। ज़मीन गीली हो रही थी। और लगा— हम भी बारिश की बूँदें जैसे हैं।
कभी ऊपर से गिरते हैं। कभी ज़मीन पर टकराते हैं। कभी बह जाते हैं नालों में। कभी पेड़ की पत्ती पर ठहर जाते हैं।
पर हर बूँद का अपना सफर होता है। वो कभी नहीं पूछती— “मैं कहाँ जा रही हूँ?” वो बस गिरती है। और गिरते-गिरते… कहीं न कहीं पहुँच जाती है।
कभी समंदर में मिल जाती है। कभी मिट्टी में समा जाती है। कभी बादल बनकर फिर ऊपर उठ जाती है।
आज मैंने खुद से कहा— “विनय… तू भी बूँद है। तुझे मंज़िल की चिंता छोड़ दे। बस गिरने दे। बहने दे। ठहरने दे। कभी तेज़, कभी धीमे।
पर गिरना मत छोड़ना। क्योंकि गिरना ही तो जीवन है। और गिरते-गिरते… तू भी कहीं न कहीं पहुँच जाएगा। शायद वही जगह जहाँ तुझे होना था।”
बूँदें अब भी गिर रही थीं। पर अब वो डरावनी नहीं लग रही थीं। अब वो बस… ज़िंदगी की तरह लग रही थीं। सुंदर। आज़ाद। और बहुत ईमानदार।
शुभ प्रभात। हनुमानगढ़ की इस बारिश भरी, ठंडी और बहुत सच्ची सुबह से। आज बस इतना ही। और यही बहुत है।
क्योंकि हम सब बारिश की बूँदें हैं। और बूँदें कभी नहीं पूछतीं— “मैं कहाँ जा रही हूँ?” वो बस गिरती हैं। और गिरते-गिरते… खुद को पूरा कर लेती हैं।
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