आज खुद से एक अजीब सवाल पूछा—

“तू सच में जी रहा है…
या बस दूसरों को दिखा रहा है कि जी रहा है?”
दिन भर भागता रहा—
काम, लोग, बातें, जिम्मेदारियाँ…
पर रात को समझ आया—
मैं कहीं पहुँचा ही नहीं।
मैं बस व्यस्त था…
मगर ज़िंदा नहीं।
अजीब है ना—
हम जिंदगी को आसान बनाने के लिए
इतना कुछ जोड़ते जाते हैं…
कि एक दिन खुद ही
जिंदगी से हट जाते हैं।
आज फैसला लिया है—
अब हर चीज़ जरूरी नहीं होगी,
कुछ चीज़ें बस “सच्ची” होंगी।
कम लोग होंगे…
पर अपने होंगे।
कम काम होगा…
पर अपना होगा।
और शायद…
कम दिखावा होगा,
तो पहली बार
मैं सच में जिंदा महसूस करूंगा।
-Rakesh Karwasra
मैं व्यस्त था… इसलिए जीना भूल गया।
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