सुबह की पहली धुंध ने खिड़की पर हाथ रखा, मन चुपचाप बैठ गया—न कोई सवाल, न कोई शोर। चाय का कटोरा हाथ में ठहरा, भाप धीरे-धीरे ऊपर उठी, जैसे कोई अनकही बात आसमान को छूने चली। मैंने पूछा नहीं, सुना भी नहीं। बस खड़ा रहा—हनुमानगढ़ की इस शांत सुबह में, जहाँ खेतों से उठता धुआँ…