आज मैंने अपने शब्दों को नहीं,अपनी चुप्पी को सुना। वो खाली नहीं थी।उसमें दबे हुए जवाब थे,कुछ “हाँ” जो दरअसल “नहीं” थे,कुछ मुस्कानें जो समझौते से भरी थीं। मैं अक्सर सोचता हूँ —चुप रहना परिपक्वता है।पर क्या हर चुप्पी समझदारी होती है?या कभी-कभी यह डर की सभ्य शक्ल होती है? कई बार मैं इसलिए नहीं…