10 फरवरी, 2026 | मंगलवार की सुबह

अलार्म बजने से पहले…
“आँख खुल गई। अच्छा है, आज मैं पहले जागा।”
“या फिर नींद ही अधूरी रही?”
“नहीं, आज कुछ अलग करने की चाह है। उठ जा।”
बिस्तर छोड़ते हुए…
“ठंड है बाहर…”
“गर्म रजाई में पड़े रहने से कुछ नहीं होगा। जो काम करने हैं, वो तो करने ही पड़ेंगे।”
“पर इतनी जल्दी क्या है?”
“जल्दी नहीं, जागरूकता है। सुबह जितनी शांत होती है, मन उतना ही साफ। इसे गँवा मत।”
खिड़की से बाहर झाँकते हुए…
“कितनी ख़ूबसूरत सुबह है…”
“हर सुबह ख़ूबसूरत होती है, बस तू रोज़ देखता नहीं।”
“आज देख रहा हूँ ना।”
“तो इसे महसूस कर। ये सुबह फिर कभी नहीं आएगी। आज का आज ही है।”
आईने के सामने…
“चेहरे पर कुछ अलग चमक है आज।”
“क्योंकि तू जागा है, भागा नहीं। इरादे से उठा है, मजबूरी से नहीं।”
“पर क्या आज सब कुछ ठीक हो जाएगा?”
“सब कुछ ठीक हो, ये ज़रूरी नहीं। बस तू ठीक रह, बाकी संभल जाएगा।”
चाय बनाते हुए…
“आज क्या करना है?”
“पहले ये सोच कि आज कैसा महसूस करना है। काम तो होते रहेंगे, पर तेरी ऊर्जा कहाँ लगानी है?”
“जो ज़रूरी है उसमें।”
“बिल्कुल। और जो व्यर्थ है, उसे जाने दे। आज से ही।”
डायरी खोलते हुए…
“कल की अधूरी बातें…”
“उन्हें आज पूरा करने का मौका है। या फिर उन्हें छोड़ने का। दोनों में हिम्मत चाहिए।”
“तो मैं क्या चुनूँ?”
“जो तुझे हल्का करे, वही सही है। बोझ ढोना बहादुरी नहीं है।”
तैयार होते हुए…
“आज थोड़ा अच्छा लग रहा है।”
“क्योंकि तूने ख़ुद पर ध्यान दिया। ये छोटी-छोटी चीज़ें ही तो हैं जो दिन बनाती हैं।”
“पर बाहर जाकर फिर वही भागदौड़…”
“तो उसे भागदौड़ मत बना, एक नृत्य बना ले। तेरी लय पर चले दुनिया, दुनिया की लय पर तू नहीं।”
दरवाज़े की दहलीज़ पर…
“चलूँ?”
“हाँ, पर एक बात याद रख…”
“क्या?”
“तू अकेला नहीं है। तेरे साथ तेरी हिम्मत है, तेरा हौसला है, और सबसे बड़ी बात – तू ख़ुद अपने साथ है।”
“काफ़ी है ना?”
“बिल्कुल काफ़ी है।”
सूरज की तरफ़ देखते हुए…
“आज कुछ अच्छा होगा।”
“आज कुछ अच्छा करेगा। फ़र्क समझ। तू इंतज़ार मत कर, शुरुआत कर।”
“ठीक है। चलता हूँ।”
“जा, और याद रख – तू जितना सोचता है, उससे कहीं ज़्यादा ताक़तवर है।”
“हर सुबह एक नया पन्ना है। कल की गलतियों की स्याही से आज को मत ढक। आज को आज की रोशनी में जी।”
— शुभ प्रभात, ख़ुद से
–Rakesh Karwasra
copyright@rakeshkarwasra.com
Good job….