–Rakesh Karwasra

जब उम्र ने कंधे पर हाथ रखकर कहा—
“चलो, अब थोड़ा धीमे चलें,”
तब पहली बार
मैंने समय की साँस सुनी।
जो दिन बीत गए,
वे अब स्मृतियों के दीप हैं,
और जो बचे हैं—
वे उधार की रोशनी नहीं,
मेरी अपनी ज्योति हैं।
अब किसी की विदाई पर आँसू नहीं,
क्योंकि जाना
जीवन का अपमान नहीं—
उसकी पूर्णता है।
मेरे बाद क्या होगा—
यह प्रश्न अब हवा के साथ छोड़ दिया है;
नदी मेरे बिना भी बहेगी,
आकाश मेरा नाम नहीं पुकारेगा।
अब पद का शोर नहीं सुनाई देता,
न धन की चमक आँखें चकाचौंध करती है।
मैंने देखा—
शक्ति भी क्षणिक है,
और भय भी मन की उपज।
अब मैं अपने लिए
थोड़ी-सी दोपहर बचा लेता हूँ,
थोड़ा-सा सन्नाटा,
थोड़ी-सी मुस्कान।
छोटे हाथों की मेहनत में
मोलभाव नहीं करता,
कभी-कभी कीमत से ज्यादा
सम्मान दे देता हूँ।
बहस की आग में
अब अपनी शांति नहीं झोंकता,
क्योंकि समझ गया हूँ—
हर जीत
ज़रूरी नहीं होती।
बुज़ुर्गों की दोहराई बातों में
अनुभव का कंपन सुनता हूँ,
बच्चों की जिद में
भविष्य की धड़कन।
अब ब्रांड नहीं,
चेहरों की सच्चाई पढ़ता हूँ।
प्रतिस्पर्धा से उतरकर
मैंने जीवन को
एक सरल पगडंडी बना लिया है।
अब हर साँस
उपलब्धि नहीं—
उपहार है।
अंततः सब यहीं रहेगा—
नाम, वस्त्र, परिचय।
साथ जाएगा तो केवल
प्रेम का स्पर्श,
आदर की गंध,
और मानवता की गरिमा।
देर से ही सही—
अब जाना है,
जीना संग्रह नहीं,
त्याग की सहजता है।
हाँ…
अब मैं शेष दिनों का उत्सव मनाता हूँ। 🌿
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जो जीवन की गहराई को समझते हैं।