सुबह की पहली रोशनी खिड़की से आई तो मन ने कहा: “कल तूने पुराने में नया ढूँढने की बात की… आज क्या ढूँढा?”

मैंने चाय बनाई। वही पुरानी गैस, वही पुरानी केतली, वही पुरानी आवाज़। लेकिन आज मैंने ध्यान से सुना। केतली की सीटी में एक छोटी सी लय थी – जैसे कोई पुराना गाना धीरे-धीरे याद आ रहा हो। चाय की खुशबू में आज थोड़ी सी इलायची की महक ज्यादा लगी। पुरानी खुशबू, लेकिन आज नई लगी।
तो मैंने खुद से कहा: “आज मैं पुरानी चीज़ों को ‘पुरानी’ कहकर छोड़ दूँगा नहीं। मैं उन्हें ‘परिचित’ कहूँगा और पूछूँगा – ‘आज तू मुझे क्या नया बता रही है?’ क्योंकि जीवन कोई ड्राफ्ट नहीं है। पुरानी लाइनें मिटानी नहीं पड़तीं – बस उन्हें नए कोण से पढ़ना पड़ता है। और जब नए कोण से पढ़ते हैं, तो वही पुरानी लाइनें नई कहानी सुनाती हैं।”
मन ने फिर एक छोटा सा तीर चलाया: “और अगर आज फिर वही पुरानी थकान आई? वही पुरानी बेचैनी, वही पुरानी खामोशी?”
मैंने जवाब दिया: “तो आने दो। लेकिन इस बार मैं उसे पुरानी किताब की तरह खोलूँगा। पिछली बार जब पढ़ा था तो शायद गुस्से से पढ़ा था। आज शांति से पढ़ूँगा। पुरानी थकान भी नई बात कह सकती है – अगर मैं उसे नए दिल से सुनूँ। शायद वो कह रही हो: ‘रुक जा, थोड़ा आराम कर ले।’ और वो सुनना भी नया है।”
आज का छोटा संकल्प:
- मैं आज एक पुरानी आदत को थोड़ा सा बदलकर करूँगा – चाय को बाएँ हाथ से पकड़ूँगा, या कुर्सी पर उल्टी दिशा में बैठूँगा।
- और खुद से कहूँगा: “पुराना होना बुरा नहीं। पुराने को नए नज़रिए से देखना ही जीना है।”
आज का एक सवाल खुद से: “अगर आज सब कुछ वही पुराना लगा, तो क्या तू कहेगा – ‘फिर वही दिन’… या कहेगा – ‘आज मैंने पुराने को नए तरीके से देखा’?”
मेरा जवाब आज: आज मैंने पुराने को नए तरीके से देखा। और वो बहुत ताज़गी भरा लगा।
शुभ प्रभात, जयपुर की पुरानी गलियों वाली, लेकिन हमेशा नई सुबह से। ☕🌿 आज एक पुरानी चीज़ में थोड़ा नया ढूँढ लो। वो मिल जाएगा – और मुस्कान के साथ आएगा।
-Rakesh Karwasra
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