
आज का आत्मसंवाद – 9 मार्च 2026
आज सुबह
मैंने खुद से कोई वादा नहीं किया।
न यह कहा कि आज बेहतर बनना है,
न यह कि आज कुछ हासिल करना है।
बस चुपचाप बैठ गया।
कुछ देर बाद
एक अजीब-सी बात समझ आई—
हम पूरी जिंदगी
“कुछ बनने” की कोशिश में बिताते हैं।
कभी अच्छा इंसान बनने में,
कभी सफल बनने में,
कभी किसी की उम्मीदों के लायक बनने में।
और इस दौड़ में
एक चीज धीरे-धीरे खो जाती है—
हमारा “होना”।
आज मैंने पहली बार
उस “होने” को महसूस किया।
न कोई लक्ष्य था,
न कोई परिभाषा।
बस एक साधारण-सी साँस थी
जो अंदर जा रही थी…
और बाहर आ रही थी।
तभी मन ने धीरे से पूछा—
अगर तुम्हारे सारे नाम
तुमसे छीन लिए जाएँ…
अगर तुम्हारी सारी उपलब्धियाँ
तुमसे दूर हो जाएँ…
अगर लोग तुम्हें पहचानना बंद कर दें…
तो क्या तुम फिर भी
खुद को पहचान पाओगे?
कुछ देर खामोशी रही।
फिर भीतर से एक हल्की-सी आवाज आई—
मैं वो नहीं हूँ
जो दुनिया मेरे बारे में सोचती है।
मैं वो भी नहीं हूँ
जो मैं खुद को साबित करने की कोशिश करता हूँ।
मैं शायद बस
एक चेतना हूँ
जो इस क्षण को देख रही है।
जो इस जीवन को
धीरे-धीरे unfold होते हुए महसूस कर रही है।
और शायद
जीवन का असली रहस्य यही है—
कि हम इसे समझने की कोशिश में
इसे खो देते हैं।
जबकि जीवन
समझने के लिए नहीं,
जीने के लिए आया है।
आज मैंने खुद से कहा—
तुम्हें हर सवाल का जवाब नहीं चाहिए।
तुम्हें बस इतना जानना है
कि इस विशाल ब्रह्मांड में
एक छोटी-सी चेतना
इस क्षण में जाग रही है।
और वही
सबसे बड़ा चमत्कार है।
आज का चिंतन:
जब हम खुद को साबित करना छोड़ देते हैं,
तभी हम पहली बार
खुद को जानना शुरू करते हैं।
शुभ प्रभात।
हनुमानगढ़ की शांत, धीमी सुबह से।
— Rakesh Karwasra
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