
कभी-कभी रात को सोने से पहले जब हम मोबाइल की स्क्रीन बंद करते हैं, तो एक अजीब-सी थकान महसूस होती है। यह थकान शरीर की नहीं होती, यह मन की थकान होती है। पूरे दिन हम न जाने कितने लोगों की ज़िंदगी देख चुके होते हैं। किसी की नई कार, किसी की विदेश यात्रा, किसी की शादी, किसी की सफलता, किसी की मुस्कुराती हुई तस्वीरें। हम सब कुछ देख लेते हैं, सिवाय अपनी ज़िंदगी के।
हम इस भ्रम में जी रहे हैं कि हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि हम धीरे-धीरे खुद से कटते जा रहे हैं। हमारे पास हर किसी की कहानी की जानकारी है, लेकिन अपनी कहानी के बारे में हम पहले से कम जानते हैं। हमें पता है कि कौन कहाँ घूमने गया, किसने कौन-सी उपलब्धि हासिल की, किसने नया घर खरीदा, लेकिन हमें यह नहीं पता कि आख़िरी बार हमने अपने दिल से क्या चाहा था।
सोशल मीडिया ने हमें एक ऐसा आईना दिया है जिसमें हम अपना चेहरा नहीं देखते, बल्कि दूसरों का जीवन देखते रहते हैं। धीरे-धीरे यह देखने की आदत तुलना में बदल जाती है। फिर तुलना असंतोष में बदल जाती है। और असंतोष हमें यह विश्वास दिलाने लगता है कि हमारी ज़िंदगी में कुछ कमी है।
विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति की तस्वीर देखकर हम अपनी ज़िंदगी को कमतर समझ रहे होते हैं, वह भी शायद किसी और की तस्वीर देखकर यही सोच रहा होता है। यह तुलना का एक अंतहीन चक्र है, जिसमें कोई विजेता नहीं होता। हर कोई किसी और जैसा बनने की कोशिश कर रहा है और इसी कोशिश में अपने जैसा होना भूल रहा है।
हमारा बचपन ऐसा नहीं था। तब हम दूसरों की ज़िंदगी नहीं देखते थे। हम अपनी ज़िंदगी जीते थे। बारिश होती थी तो भीगते थे, पतंग उड़ती थी तो उसके पीछे भागते थे, शाम होती थी तो दोस्तों के साथ खेलते थे। तब हमारे पास दिखाने के लिए बहुत कम था, लेकिन जीने के लिए बहुत कुछ था। आज दिखाने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन जीने के लिए समय कम पड़ता जा रहा है।
सबसे बड़ा नुकसान यह नहीं है कि हम समय बर्बाद कर रहे हैं। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि हम अपनी इच्छाओं को खोते जा रहे हैं। धीरे-धीरे हमारी चाहतें भी हमारी नहीं रह जातीं। हम वही चाहने लगते हैं जो हमें बार-बार दिखाया जाता है। हम वही बनने की कोशिश करते हैं जिसे समाज सफल घोषित करता है। और फिर एक दिन हम पाते हैं कि जिस जीवन के पीछे हम भाग रहे थे, वह कभी हमारा सपना था ही नहीं।
कई लोग पूरी उम्र इस भ्रम में गुज़ार देते हैं कि वे अपना जीवन जी रहे हैं। लेकिन सच यह है कि वे दूसरों की अपेक्षाओं, दूसरों की उपलब्धियों और दूसरों की परिभाषाओं के बीच जी रहे होते हैं। उनका जीवन उनके हाथ में नहीं होता; वह स्क्रीन पर दिखाई देने वाली तस्वीरों, लाइक्स और ट्रेंड्स के हाथ में होता है।
ज़रा रुककर सोचिए। आख़िरी बार आपने अपने जीवन को कब देखा था? आख़िरी बार कब आपने बिना किसी तुलना के यह महसूस किया था कि आपके पास क्या है? आख़िरी बार कब आपने अपने मन से पूछा था कि वह वास्तव में क्या चाहता है?
हो सकता है आपकी ज़िंदगी उतनी चमकदार न हो जितनी सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली ज़िंदगियाँ हैं। लेकिन वह आपकी है। उसमें आपके संघर्ष हैं, आपकी यादें हैं, आपके सपने हैं, आपकी असफलताएँ हैं और आपकी यात्राएँ हैं। वह किसी फ़िल्टर से सुंदर नहीं बनी है, वह अनुभवों से बनी है।
शायद जीवन का सबसे बड़ा साहस यह नहीं है कि हम दुनिया को दिखाएँ कि हम कौन हैं। शायद सबसे बड़ा साहस यह है कि हम खुद को देखने का समय निकालें। स्क्रीन से नज़र हटाकर अपने भीतर झाँकें। देखें कि हम कहाँ हैं, क्या महसूस कर रहे हैं, और किस दिशा में जाना चाहते हैं।
क्योंकि एक दिन जब जीवन समाप्त होने के करीब होगा, तब हमें यह अफसोस नहीं होगा कि हमने दूसरों की पोस्ट कम देखी थीं। अफसोस शायद यह होगा कि हमने अपनी ही ज़िंदगी को पर्याप्त ध्यान से नहीं देखा।
इसलिए कभी-कभी मोबाइल की स्क्रीन बंद कर दीजिए। दुनिया कुछ देर इंतज़ार कर सकती है। लेकिन आपकी ज़िंदगी नहीं। वह हर दिन आपके सामने से गुज़र रही है, और वह चाहती है कि आप उसे देखें, महसूस करें और सचमुच जिएँ।
क्योंकि जीवन स्क्रॉल करने की चीज़ नहीं है, जीने की चीज़ है।
— राकेश कड़वासरा
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