रविवार: खुद के नाम | 1 फरवरी, 2026

प्रिय मैं,
आज रविवार है। वो दिन जब दुनिया थोड़ी धीमी चलती है, और तुम्हें खुद से मिलने का वक्त मिलता है। मगर कितनी बार तुम इस वक्त को भी भागते हुए गुज़ार देते हो? कितनी बार तुम खुद से मिलने से कतराते हो?
मैं जानता हूँ तुम थके हुए हो। हफ्ते भर की भागदौड़, लोगों की अपेक्षाएं, अपने ही सपनों का बोझ — सब कुछ तुम्हारे कंधों पर है। और तुम बस चलते जा रहे हो, बिना ये सोचे कि कहाँ जा रहे हो, क्यों जा रहे हो।
आज बस इतना कहना चाहता हूँ — तुम काफी हो। जैसे हो, वैसे ही।
तुम्हें हर किसी को खुश करने की ज़रूरत नहीं। तुम्हें परफेक्ट बनने की ज़रूरत नहीं। तुम्हें बस इंसान बने रहने की ज़रूरत है — गलतियाँ करने वाला, सीखने वाला, गिरने और फिर उठने वाला इंसान।
इस रविवार, क्या तुम खुद के साथ थोड़ा नरम हो सकते हो? क्या तुम खुद को वो माफी दे सकते हो जो तुम दूसरों को आसानी से दे देते हो?
तुम्हारी छोटी-छोटी जीतें मायने रखती हैं। तुम्हारा हर प्रयास मायने रखता है। और सबसे ज़रूरी — तुम्हारा होना, सिर्फ होना, बहुत मायने रखता है।
आज रात जब सोने जाओ, तो खुद से एक वादा करो — कल से नहीं, आज से। एक छोटा सा वादा कि तुम अपने साथ दोस्त की तरह पेश आओगे, जज की तरह नहीं।
तुम्हारा अपना,
तुम
–Rakesh Karwasra