
सुबह उठते ही पहला विचार आया: “कल वैलेंटाइन डे था… आज क्या बचा है? सिर्फ़ एक दिन का उत्सव खत्म हो गया?”
मैंने खुद से कहा: “नहीं। आज वो दिन है जब प्यार की असली परीक्षा होती है। जब गुलाब की पंखुड़ियाँ मुरझा जाती हैं, चॉकलेट ख़त्म हो जाती है, मैसेज रीड होकर आर्काइव में चले जाते हैं… तब असली प्यार क्या करता है?”
मन ने तुरंत जवाब दिया: “चुपचाप रह जाता है। रोज़ की तरह साथ देता है। बिना तारीफ़ माँगे, बिना फोटो पोस्ट किए।”
सही कहा। प्यार असल में उन छोटे-छोटे दिनों में बसता है, जहाँ कोई स्पेशल टैग नहीं होता। जहाँ कोई “हैप्पी…” नहीं लिखता, फिर भी सुबह चाय बनाकर रख देता है। जहाँ कोई कहता नहीं “आई लव यू”, पर तुम्हारी थकान देखकर चुपचाप कंधा दे देता है।
तो आज मैंने खुद से एक अनोखा वादा किया:
- मैं आज किसी को “स्पेशल” बनाने की बजाय, किसी के “नॉर्मल” दिन को थोड़ा बेहतर बनाने की कोशिश करूँगा।
- मैं किसी को इम्प्रेस नहीं करूँगा, बस ईमानदार रहूँगा।
- मैं प्यार को एक दिन का इवेंट नहीं, बल्कि एक रोज़ाना की आदत बनाऊँगा।
क्योंकि असली प्यार वो नहीं जो 14 तारीख़ को चमकता है। वो तो वो है जो 15 तारीख़ को भी, 16 को भी, और बरसों बाद भी वही रहता है – शांत, स्थिर, बिना शोर के।
आज का सवाल खुद से: “कल के बाद आज मैंने खुद के साथ, या किसी और के साथ, प्यार को कैसे ज़िंदा रखा?”
अगर जवाब “बस ऐसे ही… थोड़ा सा ध्यान देकर” है, तो समझ लो – तुम सही ट्रैक पर हो।
शुभ प्रभात। प्यार को उत्सव मत बनाओ… उसे जीवन का हिस्सा बना लो। बाकी सब अपने आप ख़ूबसूरत हो जाएगा।
-Rakesh Karwasra
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