सुबह उठकर सबसे पहले मन ने पूछा: “कल तूने कहा था – गर्माहट हो या ठंडक, दोनों मेरी हैं… आज क्या फील हो रहा है?”

मैंने खिड़की खोली। आज हवा में न ठंडक थी, न तेज़ गर्मी। बस एक हल्की-सी नरमी। चाय बनाई – न ज्यादा गर्म, न ठंडी। बिल्कुल संतुलित। जैसे प्रकृति भी कह रही हो: “आज आराम से जी ले।”
तो मैंने खुद से कहा: “आज मैं संतुलन को जज नहीं करूँगा। न ज्यादा उत्साह में उड़ूँगा, न उदासी में डूबूँगा। बस जीऊँगा – जैसे है, वैसे। क्योंकि जीवन कोई ड्राफ्ट नहीं है। हर दिन एक नया संस्करण नहीं लिखना पड़ता। जो आज है, वही सही है।”
मन ने फिर एक छोटा सा सवाल किया: “और अगर आज कुछ खास नहीं हुआ? न कोई बड़ी खुशी, न कोई गहरी उदासी… बस एक साधारण दिन?”
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया: “तो साधारण ही सही। साधारण दिन भी मेरी कहानी का हिस्सा हैं। वही दिन हैं जो मुझे सिखाते हैं कि खुशी हमेशा बड़े धमाके में नहीं होती। वो छोटी-छोटी चाय के घूँटों में, हल्की हवा में, साधारण साँसों में छिपी रहती है।”
आज का छोटा संकल्प:
- मैं आज एक भी भावना को “कम” या “ज़्यादा” नहीं कहूँगा।
- बस उसे महसूस करूँगा – बिना लेबल लगाए।
- और खुद से कहूँगा: “तू जैसा है, वैसा ही काफी है।”
आज का एक सवाल खुद से: “अगर आज का दिन पूरी तरह साधारण रहा, तो क्या तू कहेगा – ‘कुछ खास नहीं हुआ’… या कहेगा – ‘आज मैं जीया हूँ, यही खास था’?”
मेरा जवाब आज: आज मैं जीया हूँ। यही खास था।
–Rakesh Karwasra
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ से नहीं – आज जयपुर की नरम सुबह से। ☕🌿 आज साधारण होने दो। साधारण में भी बहुत सुंदरता है।
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