सुबह की पहली धुंध ने खिड़की पर हाथ रखा, मन चुपचाप बैठ गया—न कोई सवाल, न कोई शोर। चाय का कटोरा हाथ में ठहरा, भाप धीरे-धीरे ऊपर उठी, जैसे कोई अनकही बात आसमान को छूने चली।

मैंने पूछा नहीं, सुना भी नहीं। बस खड़ा रहा—हनुमानगढ़ की इस शांत सुबह में, जहाँ खेतों से उठता धुआँ मेरी साँसों से मिल रहा था, और दूर कहीं गाय की घंटी धीमे-धीमे बज रही थी—जैसे समय खुद अपनी लय भूल गया हो।
चुप्पी भी तो एक भाषा है, जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं पड़ती। वो धुंध की तरह फैलती है, सब कुछ ढक लेती है, फिर भी सब कुछ दिखा देती है— अगर आँखें बंद करके देखें।
आज मन ने बहस नहीं की, न कोई पुराना सवाल उछाला। बस मेरे बगल में बैठा रहा— जैसे कोई पुराना दोस्त, जिसे अब बात करने की ज़रूरत नहीं।
मैंने खुद से कहा (धीमे से, जैसे हवा से): “चुप रहना भी जीना है। चुप रहकर भी साँस लेना, चुप रहकर भी सुनना, चुप रहकर भी होना— यही तो असली होने का मतलब है।”
आज का संकल्प छोटा-सा, पर गहरा: दस मिनट चुप रहूँगा। न सोचूँगा, न प्लान बनाऊँगा। बस खिड़की के पास खड़ा रहूँगा, हनुमानगढ़ की धुंध को, अपनी साँसों को, और अपनी चुप्पी को… एक प्यार भरी नज़र से देखूँगा।
आज का सवाल (खुद से, धीमे से): अगर चुप्पी बोल पाती, तो वो तुमसे क्या कहती?
मेरा जवाब: वो कहती— “तुम पहले से ही पूरा हो। बस थोड़ा रुक जाओ… और सुनो।”
-Rakesh Karwasra
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की धुंध से लिपटी, चुप्पी से सनी सुबह से। ☁️🤍 आज थोड़ी चुप्पी बुन लो। वो तुम्हें बहुत कुछ कह जाएगी।
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