(एक विचार जो अक्सर मन में कौंधता है…)

लाखों की पाजेब पैरों में चमकती है, एक रुपए की बिंदी माथे को सजाती है। कीमत बाज़ार तय करता है — दुर्लभता, माँग से। मूल्य? वो हमारी चेतना, हमारी आत्मा तय करती है।
दार्शनिकों ने सदियों से ये सवाल पूछा है: क्या वाकई मूल्यवान वही है जो महँगा है?
भारतीय दर्शन में पुरुषार्थ की बात है — धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। अर्थ (धन-कीमत) जरूरी है, लेकिन अंतिम नहीं। धर्म और मोक्ष ही जीवन को सच्चा अर्थ देते हैं।
प्लेटो कहते थे — सच्चा मूल्य आइडिया के जगत में है: सत्य, सुंदरता, अच्छाई। बाज़ार की कीमतें तो सिर्फ छाया हैं।
अरस्तू का ईउदेमोनिया — पूर्ण, सार्थक जीवन, धन के ढेर से नहीं मिलता।
और ओस्कर वाइल्ड की वो मारक बात: “आजकल लोग हर चीज़ की कीमत जानते हैं, और किसी चीज़ का मूल्य नहीं।” (Nowadays, people know the price of everything and the value of nothing.)
हम दूध में मिलावट ढूँढते हैं — क्योंकि वो जीवन से जुड़ा है। शराब पर सवाल नहीं — क्योंकि आदत बोलती है।
मोबाइल हर ६ महीने में नया चाहिए, EMI चुकाते हैं। किताब? “लाइब्रेरी से मिल जाएगी…”
जिम में महँगी मशीनें, ट्रेनर — बॉडी दिखनी चाहिए। मन की जिम्नास्टिक — ध्यान, चिंतन? “टाइम कहाँ से लाएँ?” 🧘♂️
कीमत बाज़ार की है, मूल्य चेतना का। जब चेतना सो जाती है, कीमतें हमें नचाती हैं।
असली सवाल: हम किसे महत्व दे रहे हैं? और क्यों? क्या हम पुरुषार्थ को जी रहे हैं, या सिर्फ अर्थ के पीछे भाग रहे हैं?
सोचिए… भ्रम टूटने पर ही सच्चा मूल्य मिलता है। ✨
आपके साथ कभी ऐसा हुआ? कीमत ने आपको मूल्य से दूर कर दिया? कमेंट में बताइए, शेयर कीजिए अगर छुआ।
-Rakesh Karwasra
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