
सुबह की चाय ठंडी हो रही थी। कटोरे में धुंध जैसी भाप तैर रही थी। हनुमानगढ़ की खिड़की से धुंध बाहर भी तैर रही थी। और मन ने धीरे से, जैसे कोई पुराना ज़ख्म छूते हुए, पूछा: “रिश्ते… क्यों इतने भारी लग रहे हैं आज?”
मैं चुप रहा। कटोरा हाथ में ठंडा हो गया था। फिर आँखें बंद कीं। और याद आया— वो छोटी-सी बात जो कभी नहीं कही। वो गले लगना जो कभी नहीं हुआ। वो “सॉरी” जो ज़बान पर आकर रह गया। वो “आई लव यू” जो कभी बाहर नहीं निकला।
मन रो पड़ा (बिना आवाज़ के): “हम उन्हें हर दिन सुधारते हैं, पर सुधारते-सुधारते उन्हें खो देते हैं। रिश्ता कोई ड्राफ्ट नहीं है, राकेश। एक बार लिखा, वही अंतिम। फिर भी हम पेंसिल से लिखते रहते हैं, मिटाते रहते हैं, और आखिर में कागज़ फट जाता है।”
मैंने आँखें खोलीं। चाय का आखिरी घूँट लिया—कड़वा था। फिर बोला (आवाज़ काँपती हुई): “तो क्या अब कुछ नहीं कर सकते? रिश्तों को ऐसे ही छोड़ दें? बिना कुछ कहे, बिना माफ़ी माँगे, बिना गले लगाए?”
मन ने सिर झुकाकर कहा: “नहीं। रिश्ते छोड़ने के लिए नहीं होते। वे रखने के लिए होते हैं। आज जो बचा है—उसी को थाम लो। न कल की उम्मीद में डालो, न कल के डर में छोड़ दो। आज जो है—उसे थोड़ा सा गले लगा लो। थोड़ा सा नाम ले लो। थोड़ा सा चुप रहकर सुन लो। क्योंकि जो आज थोड़ा सा रख लिया, वही कल पूरा हो सकता है। और जो आज खो दिया… वो कभी नहीं मिलता।”
आज का संकल्प (आँखों में आँसू लिए):
- आज किसी एक रिश्ते को (माँ, पिता, दोस्त, साथी… या खुद से भी) सिर्फ़ “रखने” की कोशिश करूँगा।
- न सुधारने की, न बदलने की।
- बस रखने की—जैसे कोई पुरानी तस्वीर को सीने से लगाते हैं।
- और अगर वो भारी लगे, तो कहूँगा: “आज इतना ही काफी है। कल फिर कोशिश करूँगा। पर आज… तू मेरे पास है, यही बहुत है।”
आज का सवाल (खुद से, गले में कुछ अटकते हुए): अगर आज मैं किसी रिश्ते को बिना कुछ कहे, बिना सुधारे, बस ऐसे ही थाम लूँ— तो क्या वो टूट जाएगा… या मेरे हाथों में और मज़बूत हो जाएगा?
मेरा जवाब (आँसू गले में अटककर): आज मैंने उसे थामा। और लगा… वो पहले से ज़्यादा पास आ गया। शायद इसलिए कि आज मैंने उसे “सुधारने” की बजाय “प्यार करने” दिया।
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की धुंध से सनी, रिश्तों की कड़वी-मीठी सुबह से। आज एक रिश्ते को थोड़ा सा थाम लो। बिना कुछ कहे। बिना कुछ सुधारे। बस थाम लो। देखना—कितना हल्का लगेगा दिल। और कितना भारी… प्यार।
-Rakesh Karwasra
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शब्द कम है या शायद व्यक्त नहीं कर सकती सिर्फ महसूस कर सकती हूँ एक एक शब्द को…