सुबह उठकर सबसे पहले खिड़की नहीं खोली। बिस्तर पर ही लेटे रहे। चाय बनाने की आदत आज थोड़ी देर के लिए रुक गई। मन ने पूछा— “क्यों नहीं उठ रहा? आज भी रविवार जैसा दिन है?”

मैंने आँखें बंद कीं। सिर्फ़ साँस ली। और लगा— कभी-कभी उठना भी एक बहुत बड़ा फैसला होता है। उठकर चाय बनाना, कप धोना, फोन चेक करना, दिन शुरू करना— ये सब छोटी-छोटी जीतें लगती हैं, पर असल में ये सिर्फ़ भागना है। दुनिया से भागना। खुद से भागना।
आज मैंने उठना टाल दिया। न चाय बनाई, न फोन उठाया। बस लेटा रहा। सुना— पंखे की हल्की आवाज़, दूर कहीं किसी ने दरवाज़ा बंद किया, और मेरी अपनी साँसें।
मन ने फिर कहा (थोड़ी सी शरारत से): “अगर आज कुछ नहीं किया तो दिन बर्बाद नहीं जाएगा?”
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया: “नहीं। बर्बाद वो दिन होता है जिसमें हमने खुद से झूठ बोला। आज मैंने झूठ नहीं बोला। मैंने कहा— ‘आज मैं थका हूँ। आज मैं बस रहना चाहता हूँ।’ और ये सच था। और सच बोलने में कितनी ताकत होती है… वो ताकत आज मुझे मिल गई।”
फिर धीरे-धीरे उठा। चाय नहीं बनाई। बस पानी पिया। खिड़की खोली। हनुमानगढ़ की सुबह में आज धुंध नहीं थी। सिर्फ़ साफ़ आसमान। और लगा— जब हम खुद से सच बोलते हैं, तब दुनिया भी साफ़ दिखने लगती है।
आज का संकल्प (बहुत छोटा, बहुत सच्चा):
- आज जो भी करूँगा, वो पहले खुद से पूछूँगा— “क्या मैं सच में ये चाहता हूँ?”
- अगर नहीं, तो रुक जाऊँगा।
- अगर हाँ, तो पूरा मन लगाकर करूँगा।
- और अगर कुछ नहीं करना चाहता, तो बस रहूँगा। बिना गिल्ट के। बिना बहाने के।
आज का सवाल (खुद से, बहुत शांत होकर): अगर आज मैंने सिर्फ़ वही किया जो सच में चाहता था— और बहुत कुछ नहीं किया— तो क्या मैं आलसी हूँ… या आज सबसे ज़्यादा सच्चा रहा?
मेरा जवाब (खिड़की से बाहर देखते हुए): आज मैं सबसे ज़्यादा सच्चा रहा। क्योंकि मैंने जो किया—वो मेरा था। और जो नहीं किया—वो भी मेरा था।
-Rakesh Karwasra
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की साफ़, शांत और सच वाली सुबह से। आज एक काम को रोककर देखो। खुद से पूछो— “क्या मैं सच में चाहता हूँ?” जवाब सुनो। और फिर फैसला लो। देखना—कितना हल्का लगेगा। कितना सच्चा। कितना जीवित।
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