सुबह उठा तो खिड़की से ठंडी हवा आई। चाय बनाई, लेकिन आज कप में डालते वक्त हाथ रुक गया। मन ने कहा— “क्यों बना रहा है? पीने के लिए? या बस आदत है?”

मैंने कटोरा मेज़ पर रख दिया। बिना पिए। बस खिड़की के पास खड़ा रहा। हनुमानगढ़ की सुबह में धुंध अभी भी थी। दूर खेतों से धुआँ उठ रहा था। एक कौवा कहीं उड़ता हुआ गुज़रा।
और अचानक लगा— ज़िंदगी में जितनी भी चीज़ें हम “करते” हैं, उनमें से कितनी सच में “चाहते” हैं?
चाय पीना। काम करना। बात करना। मुस्कुराना। सबमें एक बहुत बड़ा हिस्सा आदत का है। और आदत बहुत खतरनाक होती है। वो हमें जीने नहीं देती— वो हमें “चलते रहने” देती है।
तो आज मैंने फैसला किया— जो भी करूँगा, वो पहले पूछूँगा: “ये मैं सच में चाहता हूँ, या बस कर रहा हूँ?”
चाय नहीं पी। क्योंकि आज उसकी ज़रूरत नहीं थी। बस खड़ा रहा। सुना। देखा। साँस ली।
मन ने फिर कहा: “अगर कुछ नहीं किया तो दिन व्यर्थ नहीं जाएगा?”
मैंने जवाब दिया: “नहीं। व्यर्थ वो दिन होता है जिसमें हमने कुछ भी सच में महसूस नहीं किया। आज मैंने महसूस किया— चाय की ज़रूरत नहीं थी। मुझे सिर्फ़ ये पल चाहिए था। बस ये पल। और यही बहुत है।”
आज का संकल्प (बहुत साफ़, बहुत छोटा):
- आज से हर काम से पहले एक सवाल पूछूँगा: “ये मैं सच में चाहता हूँ?”
- अगर जवाब “नहीं” हो, तो रुक जाऊँगा।
- अगर “हाँ” हो, तो पूरा मन लगाकर करूँगा।
- और अगर सवाल ही न आए, तो बस रहूँगा।
आज का सवाल (खुद से, बहुत शांत होकर): अगर आज मैंने सिर्फ़ वही किया जो सच में चाहता था— और बहुत कुछ नहीं किया— तो क्या मैं आलसी हूँ… या आज सबसे ज़्यादा जीया हूँ?
मेरा जवाब: आज मैंने सबसे ज़्यादा जीया। क्योंकि मैंने जो किया, वो मेरा था। न आदत का। न दुनिया का। बस मेरा।
-Rakesh Karwasra
शुभ प्रभात, हनुमानगढ़ की ठंडी लेकिन साफ़ सुबह से। ☕🌫️ आज एक काम को रोककर देखो। पूछो— “क्या मैं सच में चाहता हूँ?” जवाब सुनो। और फिर फैसला लो। देखना—कितना हल्का लगेगा। कितना सच्चा।
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Aap lekhni me har shabd lgta h jaise kuch har us pdne waale inshaan se kuch kah rha jo uski apni life se bhi corelate krta h..