रविवार की सुबह। हनुमानगढ़ में धूप धीरे-धीरे आ रही थी—जैसे कोई पुराना दोस्त दरवाज़े पर खड़ा होकर कह रहा हो: “बस थोड़ा रुक जा… आज कुछ नहीं करना।”

चाय बनाई। कटोरा हाथ में लिया। खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा। कोई जल्दबाज़ी नहीं। न कोई काम का बोझ। न कोई प्लान। बस सुबह थी। और मैं था।
फिर अचानक मन में वही पुराना गाना बजने लगा— जैसे कोई पुराना रेडियो खुद-ब-खुद चालू हो गया हो:
“ज़िंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मकाम… वो फिर नहीं आते… वो फिर नहीं आते…”
आँखें भर आईं। चाय का घूँट लिया—गर्माहट गले तक उतरी, पर दिल में एक ठंडक सी फैल गई। वो मकाम याद आने लगे— वो छोटा-सा घर जहाँ माँ की हँसी थी, वो दोस्त जिसकी आवाज़ अब फोन पर भी नहीं आती, वो प्यार जो कभी पूरा नहीं हुआ, वो बच्चापन जो कभी वापस नहीं लौटा।
मन रो पड़ा (बिना आवाज़ के, पर बहुत गहराई से): “कितने मकाम गुज़र गए… और हम अभी भी उनसे चिपके बैठे हैं। उन्हें थामने की कोशिश करते हैं, जैसे वो फिर लौट आएँगे। पर वो नहीं लौटते। कभी नहीं लौटते। और हम हर रविवार को उन्हें याद करके रोते हैं… या मुस्कुराते हैं… या बस चुप रह जाते हैं।”
चाय ठंडी हो रही थी। मैंने कटोरा मेज़ पर रखा। आँखों से आँसू लुढ़क रहे थे। फिर गाना फिर से बज उठा (मन में, बहुत धीमे):
“कोई ना रुकेगा… सब चलेगा… ज़िंदगी के सफर में…”
और लगा— हाँ… सब चलेगा। पर आज रविवार है। आज मैं रुक सकता हूँ। आज मैं उन मकामों को थोड़ा सा याद कर सकता हूँ— बिना उनसे चिपके। बिना उनसे लड़ते। बिना उनसे डरते। बस याद कर सकता हूँ… जैसे कोई पुरानी तस्वीर को सीने से लगाते हैं। और फिर उन्हें धीरे से अलविदा कह सकता हूँ। क्योंकि जो गुज़र गया… वो गुज़र गया। पर जो अभी है… वो मेरे पास है। और जो मेरे पास है… वो काफी है। बहुत काफी है।
आज का संकल्प (आँखों में आँसू, दिल में थोड़ी सी मुस्कान):
- आज मैं एक पुरानी याद को थोड़ा सा याद करूँगा।
- उसे रोऊँगा।
- उसे मुस्कुराऊँगा।
- या बस चुपचाप देखूँगा।
- फिर उसे धीरे से जाने दूँगा।
- और खुद से कहूँगा: “जो गुज़र गया… वो गुज़र गया। आज जो है… वो मेरा है। और यही बहुत है। बहुत बहुत है।”
आज का सवाल (खुद से, गले में कुछ अटकते हुए): अगर आज मैं उन मकामों को जो कभी नहीं लौटेंगे, बस याद करके आगे बढ़ जाऊँ— तो क्या मैं हारा हुआ हूँ… या जीत गया हूँ?
मेरा जवाब (चाय का आखिरी घूँट लेते हुए, आँसू गाल पर लुढ़कते हुए, मुस्कान के साथ): मैं हारा नहीं। मैं जीत गया। क्योंकि मैंने उन्हें थामा नहीं— उन्हें जाने दिया। और जो जाने दिया… वो कभी बोझ नहीं बनता। वो बस एक मीठी याद बन जाता है। और यादें… कभी नहीं मरतीं। वो बस थोड़ा सा दर्द दे जाती हैं… फिर बहुत सारा प्यार।
शुभ रविवार, हनुमानगढ़ की धीमी, शांत और आँसुओं से भरी सुबह से। आज थोड़ा सा रुक जाओ। एक पुराना गाना सुन लो। एक पुरानी याद को जाने दो। और खुद से कह लो— “ज़िंदगी के सफर में… तू अभी भी चल रहा है। और यही बहुत है। बहुत बहुत है।”
-Rakesh Karwasra
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