Day : 25 Janaury 2026 आज रविवार है।दौड़ नहीं है, शोर नहीं है,सिर्फ़ खुद से मिलने का दिन है। आज मन से कहा— “थोड़ा ठहर जा…हर दिन जीतना ज़रूरी नहीं,आज बस जी लेना काफ़ी है।” आज महसूस हुआ किआराम भी एक मेहनत है,और ख़ुद को समय देनासबसे ज़रूरी ज़िम्मेदारी। आज शिकायतों की जगहकृतज्ञता रखी है,डर…
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आत्मसंवाद | Inner Dialogue – Daily
Day : 19 January 2026 “मन हल्का-सा” आज मन से कहा—खुश रहने का मतलबहर हाल में मुस्कुराना नहीं,बल्कि खुद परबेवजह बोझ न डालना है। -Rakesh Karwasra copyright@rakeshkarwasra.com
Happiness Essay Series | Essay 01
Happiness Essay Series | Essay 01 रविवार कोई साधारण दिन नहीं होता।वह समय नहीं, संवेदना होता है।एक ऐसा विराम,जहाँ घड़ी की सुइयाँ चलती तो हैं,पर मन उन पर ध्यान नहीं देता। आज इस ठहरे हुए दिन मेंमैंने खुद से एक पुराना प्रश्ननए ढंग से पूछा—खुशी आखिर है क्या? बहुत बार हम खुशी कोकिसी परिणाम से…
आत्मसंवाद | Inner Dialogue – Daily
Day : 18 Janaury 2026 आज मन ने मुझसेबिलकुल धीरे से कहा—खुशी कोई चकाचौंध नहीं,वह तो उस पल की तरह हैजब भीतर सब ठीक हो जाता हैऔर बाहर कुछ बदलने की ज़रूरत नहीं रहती। -Rakesh Karwasra copyright@rakeshkarwasra.com
आत्मसंवाद | Inner Dialogue-Daily
Day : 17 January 2026 सुबह है…मन अब भी रात से निकल रहा है।सब ठीक दिखता है,पर भीतर कुछ थका हुआ है।फिर भी उठ खड़ा हुआ हूँ।क्योंकि उम्मीद अब भी ज़िंदा है।मैं जल्दी नहीं पहुँचूँगा,पर पहुँचूँगा — यही काफ़ी है। –Rakesh Karwasra