रविवार की सुबह। हनुमानगढ़ में धूप धीरे-धीरे आ रही थी—जैसे कोई पुराना दोस्त दरवाज़े पर खड़ा होकर कह रहा हो: “बस थोड़ा रुक जा… आज कुछ नहीं करना।” चाय बनाई। कटोरा हाथ में लिया। खिड़की के पास खड़े होकर बाहर देखा। कोई जल्दबाज़ी नहीं। न कोई काम का बोझ। न कोई प्लान। बस सुबह थी।…