सुबह का पहला प्रकाश खिड़की से नहीं आया। सीधे मेरे सीने में उतर आया। चाय नहीं बनाई। कप भी नहीं उठाया। बस फर्श पर बैठ गया। पीठ दीवार से लगाई। आँखें बंद नहीं कीं—खुली रखीं। क्योंकि आज देखना था, छिपना नहीं। मन ने कोई सवाल नहीं पूछा। बस एक लंबी, धीमी साँस ली। और उस…