सुबह का पहला प्रकाश खिड़की से नहीं आया। सीधे मेरे सीने में उतर आया।

चाय नहीं बनाई। कप भी नहीं उठाया। बस फर्श पर बैठ गया। पीठ दीवार से लगाई। आँखें बंद नहीं कीं—खुली रखीं। क्योंकि आज देखना था, छिपना नहीं।
मन ने कोई सवाल नहीं पूछा। बस एक लंबी, धीमी साँस ली। और उस साँस के साथ बाहर निकला— वो सारा बोझ जो मैं सालों से “मैं हूँ” समझकर ढोता रहा।
मैंने देखा— वो बोझ मेरा नहीं था। वो दूसरों की उम्मीदें थीं। दूसरों की परिभाषाएँ थीं। दूसरों का “तुम्हें ऐसा होना चाहिए” था।
फिर पहली बार मैंने खुद से कहा— नमस्ते। तुम कौन हो? (बिना किसी जवाब की प्रतीक्षा किए)
और उस खामोशी में जवाब खुद आया— मैं वो हूँ जो अभी साँस ले रहा है। जो अभी इस फर्श पर बैठा है। जो अभी इस हवा को महसूस कर रहा है। जो अभी जी रहा है— बिना किसी “होना चाहिए” के।
आज मैंने खुद को कोई नाम नहीं दिया। न अच्छा कहा, न बुरा। न सफल, न असफल। न मजबूत, न कमजोर।
बस इतना कहा— तुम हो। और बस यही काफी है।
जब ये बात दिल में उतरी तो लगा जैसे सीने के बीच में कोई पुराना ताला खुल गया हो। और उस ताले के पीछे जो था— वो न कोई खजाना था, न कोई खालीपन। वो बस एक छोटा-सा बच्चा था… जो मुस्कुरा रहा था। क्योंकि आखिरकार उसे देख लिया गया था। बिना जजमेंट के। बिना सुधार के। बस देख लिया गया था।
आज का संकल्प नहीं है। क्योंकि संकल्प भी एक और बोझ है।
आज बस एक छोटी-सी प्रार्थना है— हे खुदा, हे ब्रह्मांड, हे जो भी हो जो मुझे बनाता है— मुझे हर सुबह इतना साहस देना कि मैं खुद को बिना किसी लेबल के देख सकूँ। और जब देख लूँ तो कह सकूँ— “अरे… तू तो बहुत प्यारा है।”
-Rakesh Karwasra
शुभ प्रभात। हनुमानगढ़ की इस साधारण-सी सुबह से। आज बस इतना ही। और यही बहुत है। 🌿
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