शाम ढल रही थी। हनुमानगढ़ की गलियों में लालिमा फैल रही थी—जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से खुल रहा हो। चाय का कटोरा हाथ में ठंडा हो चुका था। दिन की थकान कुर्सी पर ढेर हो गई थी। मन ने धीरे से, जैसे गले में कुछ अटक गया हो, पूछा: “रिश्ते… आज भी थामे रहे?”…
Life in Words………..
शाम ढल रही थी। हनुमानगढ़ की गलियों में लालिमा फैल रही थी—जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से खुल रहा हो। चाय का कटोरा हाथ में ठंडा हो चुका था। दिन की थकान कुर्सी पर ढेर हो गई थी। मन ने धीरे से, जैसे गले में कुछ अटक गया हो, पूछा: “रिश्ते… आज भी थामे रहे?”…