5 फरवरी, 2026 | गुरुवार
गुरुवार। एक और दिन।
आज मन में एक ख़याल आया — “क्या मैं काफी अच्छा हूँ?”
ये सवाल अक्सर आता है। खासकर तब, जब हम दूसरों को देखते हैं — उनकी सफलता, उनकी खुशियाँ, उनकी ज़िंदगी। और फिर अपनी तरफ देखते हैं।
और लगता है — शायद मैं पीछे रह गया हूँ।
पर आज मैंने ये भी सोचा — हर किसी की रफ्तार अलग है। किसी का पतझड़ जल्दी आता है, किसी का बसंत देर से। पर हर मौसम अपने वक़्त पर आता है।
तुलना करना आसान है। पर ये भूल जाना भी आसान है कि हर किसी का सफर अलग है। तुम जहाँ हो, वो भी किसी और के लिए एक मंज़िल हो सकती है।
“काफी अच्छा” होने की कोई परिभाषा नहीं है। तुम बस हो। और ये काफी है।
हर दिन थोड़ा बेहतर बनने की कोशिश करो। बाकी की तुलनाओं को जाने दो।
तुम पहले से ही काफी हो। बस इसे महसूस करना बाकी है।
क्या आप भी खुद की तुलना दूसरों से करते हैं? कैसे निपटते हैं इस भावना से?