आज मैंने अपने शब्दों को नहीं,
अपनी चुप्पी को सुना।
वो खाली नहीं थी।
उसमें दबे हुए जवाब थे,
कुछ “हाँ” जो दरअसल “नहीं” थे,
कुछ मुस्कानें जो समझौते से भरी थीं।
मैं अक्सर सोचता हूँ —
चुप रहना परिपक्वता है।
पर क्या हर चुप्पी समझदारी होती है?
या कभी-कभी यह डर की सभ्य शक्ल होती है?
कई बार मैं इसलिए नहीं बोला
क्योंकि सामने वाला नाराज़ हो सकता था।
कई बार इसलिए नहीं बोला
क्योंकि मुझे अपनी ही बात पर पूरा भरोसा नहीं था।
और कभी इसलिए…
क्योंकि मुझे खुद को खोने का डर था।
लेकिन आज महसूस हुआ —
जहाँ आवाज़ चाहिए, वहाँ चुप्पी
धीरे-धीरे भीतर दरार बना देती है।
चुप्पी अगर सत्य की रक्षा करे तो शक्ति है,
और अगर सुविधा की रक्षा करे तो कमजोरी।
आज का संकल्प —
हर जगह नहीं,
पर सही जगह बोलूँगा।
धीरे बोलूँगा,
साफ़ बोलूँगा,
पर अपने विरुद्ध चुप नहीं रहूँगा।
क्योंकि आत्मसम्मान
आवाज़ से नहीं,
साहस से जीवित रहता है। ✍️