सुबह उठते ही आँखें खुलीं तो सीने में एक हल्की-सी खुशी थी। न कोई वजह, न कोई बड़ी खबर। बस इतना कि मैं उठा। साँस ली। और जी रहा हूँ।

चाय बनाई। कटोरा हाथ में लिया। खिड़की खोली। हनुमानगढ़ की सुबह आज बहुत साफ़ थी। दूर खेतों में हल्की धुंध बिछी हुई थी, पर आसमान नीला-नीला। जैसे कोई कह रहा हो— “देख, सब ठीक है। तू बस देख।”
मन ने आज कोई बड़ा सवाल नहीं पूछा। बस एक छोटी-सी बात कही: “आज तू खुश है… क्यों?”
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया: “क्योंकि मैं यहाँ हूँ। क्योंकि मैंने कल रात सोचा था कि शायद सुबह न उठ पाऊँ। पर उठ गया। क्योंकि मेरे पास आज एक और दिन है। एक और साँस है। एक और चाय है। और ये सब छोटी-छोटी बातें… इन्हीं में छिपा है वो बड़ा सुख।”
चाय का घूँट लिया। गर्माहट सीने तक उतरी। और लगा— खुशी कोई बड़ी घटना नहीं होती। खुशी वो पल है जब हम रुककर देखते हैं कि हम अभी भी जी रहे हैं। हम अभी भी महसूस कर सकते हैं। हम अभी भी मुस्कुरा सकते हैं।
आज का संकल्प नहीं है। बस एक छोटी-सी बात है: जब अगली बार मन उदास हो, या क्रोध आए, या थकान लगे— तो एक बार रुककर देख लूँगा कि “मैं अभी भी यहाँ हूँ। मैं अभी भी साँस ले रहा हूँ। और यही बहुत बड़ी बात है।”
शुभ प्रभात। हनुमानगढ़ की इस साधारण, साफ़ और बहुत जीवंत सुबह से। आज बस इतना ही। और यही बहुत है।
-Rakesh Karwasra
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