शाम ढल रही थी। हनुमानगढ़ की गलियों में लालिमा फैल रही थी—जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से खुल रहा हो। चाय का कटोरा हाथ में ठंडा हो चुका था। दिन की थकान कुर्सी पर ढेर हो गई थी। मन ने धीरे से, जैसे गले में कुछ अटक गया हो, पूछा: “रिश्ते… आज भी थामे रहे?”…
Tag: रिश्तों की चाय
आज का आत्मसंवाद – 26 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह की चाय ठंडी हो रही थी। कटोरे में धुंध जैसी भाप तैर रही थी। हनुमानगढ़ की खिड़की से धुंध बाहर भी तैर रही थी। और मन ने धीरे से, जैसे कोई पुराना ज़ख्म छूते हुए, पूछा: “रिश्ते… क्यों इतने भारी लग रहे हैं आज?” मैं चुप रहा। कटोरा हाथ में ठंडा हो गया था।…