आज मैंने अपने शब्दों को नहीं,अपनी चुप्पी को सुना। वो खाली नहीं थी।उसमें दबे हुए जवाब थे,कुछ “हाँ” जो दरअसल “नहीं” थे,कुछ मुस्कानें जो समझौते से भरी थीं। मैं अक्सर सोचता हूँ —चुप रहना परिपक्वता है।पर क्या हर चुप्पी समझदारी होती है?या कभी-कभी यह डर की सभ्य शक्ल होती है? कई बार मैं इसलिए नहीं…
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आत्मसंवाद | Inner Dialogue
क्या तुम सच में जी रहे हो, या बस दिन गुज़ार रहे हो? 12 फरवरी, 2026 सुबह उठे, फ़ोन देखा, भागदौड़ शुरू। ऑफिस, काम, घर वापसी, सो गए। और फिर वही सिलसिला। पर कब रुके तुम? कब पूछा खुद से – “मैं कैसा हूँ?” हम दूसरों से बातें करते हैं, पर खुद से बात करना…
आत्मसंवाद | Inner Dialogue
10 फरवरी, 2026 | मंगलवार की सुबह अलार्म बजने से पहले… “आँख खुल गई। अच्छा है, आज मैं पहले जागा।” “या फिर नींद ही अधूरी रही?” “नहीं, आज कुछ अलग करने की चाह है। उठ जा।” बिस्तर छोड़ते हुए… “ठंड है बाहर…” “गर्म रजाई में पड़े रहने से कुछ नहीं होगा। जो काम करने हैं,…
आत्मसंवाद | Inner Dialogue – DAILY
आत्मसंवाद | Inner Dialogue – DAILY Day : 28 January 2026 जीवन हमें सिखाता है—रखना नहीं, सँभालना सीखो;भागना नहीं, महसूस करना सीखो। -Rakesh Karwasra copyright@rakeshkarwasra.com
आत्मसंवाद | Inner Dialogue – DAILY
Day : 27 Janaury 2026 आज खुद से कहा—काम की रफ़्तार नेमेरे भीतर के इंसान को पीछे छोड़ दिया था।मैं निभाता चला गया,पर जीना भूल रहा था। आज मैंने तय किया—मैं मेहनत करूँगा,पर अपनी शांति की क़ीमत पर नहीं।क्योंकि जो खुद से कट जाए,वह काम से भी जुड़ा नहीं रह पाता। -Rakesh Karwasra copyright@rakeshkarwasra.com
क्या सच में हमारे पास काम बहुत ज़्यादा है — या हम बस परेशान हैं?
इंसान अक्सर एक ही बात दोहराता है— “समय ही नहीं है।”लेकिन सवाल यह नहीं कि समय नहीं है,सवाल यह है कि हम किसमें उलझे हुए हैं? हम बिज़ी रहते हैं…पर किसी से ढंग से बात नहीं कर पाते।काम करते हैं…पर संतोष नहीं मिलता।दिन निकल जाता है…पर लगता है जैसे कुछ जिया ही नहीं। तो फिर…