सुबह की चाय ठंडी हो रही थी। कटोरे में धुंध जैसी भाप तैर रही थी। हनुमानगढ़ की खिड़की से धुंध बाहर भी तैर रही थी। और मन ने धीरे से, जैसे कोई पुराना ज़ख्म छूते हुए, पूछा: “रिश्ते… क्यों इतने भारी लग रहे हैं आज?” मैं चुप रहा। कटोरा हाथ में ठंडा हो गया था।…
कीमत और मूल्य का भ्रम
(एक विचार जो अक्सर मन में कौंधता है…) लाखों की पाजेब पैरों में चमकती है, एक रुपए की बिंदी माथे को सजाती है। कीमत बाज़ार तय करता है — दुर्लभता, माँग से। मूल्य? वो हमारी चेतना, हमारी आत्मा तय करती है। दार्शनिकों ने सदियों से ये सवाल पूछा है: क्या वाकई मूल्यवान वही है जो…
आज का आत्मसंवाद – 25 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह की पहली किरण ने खिड़की पर हाथ फेरा, धुंध अभी भी हल्की-हल्की बिछी हुई थी। चाय का कटोरा हाथ में आया—गर्म, लेकिन बहुत धीरे से ठंडा होने को तैयार। मन ने आज कोई सवाल नहीं उठाया। बस एक लंबी, गहरी साँस ली। मैं खिड़की के पास खड़ा रहा, हनुमानगढ़ की सुबह को देखता रहा—…
आज का आत्मसंवाद – 24 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह की पहली धुंध ने खिड़की पर हाथ रखा, मन चुपचाप बैठ गया—न कोई सवाल, न कोई शोर। चाय का कटोरा हाथ में ठहरा, भाप धीरे-धीरे ऊपर उठी, जैसे कोई अनकही बात आसमान को छूने चली। मैंने पूछा नहीं, सुना भी नहीं। बस खड़ा रहा—हनुमानगढ़ की इस शांत सुबह में, जहाँ खेतों से उठता धुआँ…
आज का आत्मसंवाद – 23 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह की पहली रोशनी खिड़की से आई तो मन ने कहा: “कल तूने पुराने में नया ढूँढने की बात की… आज क्या ढूँढा?” मैंने चाय बनाई। वही पुरानी गैस, वही पुरानी केतली, वही पुरानी आवाज़। लेकिन आज मैंने ध्यान से सुना। केतली की सीटी में एक छोटी सी लय थी – जैसे कोई पुराना गाना…
मेरी चुप्पी क्या कहती है?
आज मैंने अपने शब्दों को नहीं,अपनी चुप्पी को सुना। वो खाली नहीं थी।उसमें दबे हुए जवाब थे,कुछ “हाँ” जो दरअसल “नहीं” थे,कुछ मुस्कानें जो समझौते से भरी थीं। मैं अक्सर सोचता हूँ —चुप रहना परिपक्वता है।पर क्या हर चुप्पी समझदारी होती है?या कभी-कभी यह डर की सभ्य शक्ल होती है? कई बार मैं इसलिए नहीं…
अब शेष दिनों का उत्सव
–Rakesh Karwasra जब उम्र ने कंधे पर हाथ रखकर कहा—“चलो, अब थोड़ा धीमे चलें,”तब पहली बारमैंने समय की साँस सुनी। जो दिन बीत गए,वे अब स्मृतियों के दीप हैं,और जो बचे हैं—वे उधार की रोशनी नहीं,मेरी अपनी ज्योति हैं। अब किसी की विदाई पर आँसू नहीं,क्योंकि जानाजीवन का अपमान नहीं—उसकी पूर्णता है। मेरे बाद क्या…
आज का आत्मसंवाद – 21 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह उठकर सबसे पहले मन ने पूछा: “कल तूने कहा था – गर्माहट हो या ठंडक, दोनों मेरी हैं… आज क्या फील हो रहा है?” मैंने खिड़की खोली। आज हवा में न ठंडक थी, न तेज़ गर्मी। बस एक हल्की-सी नरमी। चाय बनाई – न ज्यादा गर्म, न ठंडी। बिल्कुल संतुलित। जैसे प्रकृति भी कह…
आज का आत्मसंवाद – 20 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह उठकर खिड़की खोली तो हवा में एक हल्की-सी ताज़गी थी। धुंध लगभग चली गई, ठंडक भी कम हो गई। चाय बनाई – इस बार वो गर्म थी। मन ने मुस्कुराते हुए कहा: “कल तू ठंडक को गले लगा रहा था… आज गर्माहट कैसी लग रही है?” मैंने कप थामा और बोला: “अच्छी लग रही…
आज का आत्मसंवाद – 19 फरवरी 2026 (Inner Dialogue – DAILY)
सुबह की पहली चाय हाथ में ली, लेकिन आज वो गर्म नहीं लग रही थी। मन ने तुरंत सवाल दागा: “कल तूने धुंध के बीच सुंदरता ढूँढने की बात की… आज क्या मिला?” मैंने चाय का घूँट लिया – थोड़ा ठंडा हो चुका था। बाहर अब धुंध लगभग साफ़ हो गई थी, लेकिन हवा में…