कभी-कभी रात को सोने से पहले जब हम मोबाइल की स्क्रीन बंद करते हैं, तो एक अजीब-सी थकान महसूस होती है। यह थकान शरीर की नहीं होती, यह मन की थकान होती है। पूरे दिन हम न जाने कितने लोगों की ज़िंदगी देख चुके होते हैं। किसी की नई कार, किसी की विदेश यात्रा, किसी…
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कीमत और मूल्य का भ्रम
(एक विचार जो अक्सर मन में कौंधता है…) लाखों की पाजेब पैरों में चमकती है, एक रुपए की बिंदी माथे को सजाती है। कीमत बाज़ार तय करता है — दुर्लभता, माँग से। मूल्य? वो हमारी चेतना, हमारी आत्मा तय करती है। दार्शनिकों ने सदियों से ये सवाल पूछा है: क्या वाकई मूल्यवान वही है जो…
अब शेष दिनों का उत्सव
–Rakesh Karwasra जब उम्र ने कंधे पर हाथ रखकर कहा—“चलो, अब थोड़ा धीमे चलें,”तब पहली बारमैंने समय की साँस सुनी। जो दिन बीत गए,वे अब स्मृतियों के दीप हैं,और जो बचे हैं—वे उधार की रोशनी नहीं,मेरी अपनी ज्योति हैं। अब किसी की विदाई पर आँसू नहीं,क्योंकि जानाजीवन का अपमान नहीं—उसकी पूर्णता है। मेरे बाद क्या…
आत्मसंवाद | Inner Dialogue
10 फरवरी, 2026 | मंगलवार की सुबह अलार्म बजने से पहले… “आँख खुल गई। अच्छा है, आज मैं पहले जागा।” “या फिर नींद ही अधूरी रही?” “नहीं, आज कुछ अलग करने की चाह है। उठ जा।” बिस्तर छोड़ते हुए… “ठंड है बाहर…” “गर्म रजाई में पड़े रहने से कुछ नहीं होगा। जो काम करने हैं,…
आत्मसंवाद | Inner Dialogue – DAILY
Day : 30 January 2026 जीवन सवाल नहीं पूछता,वह बस परिस्थितियाँ देता है— और हमारे भीतर छुपे सच को बाहर लाता है। –Rakesh Karwasra copyright@rakeshkarwasra.com
क्या सच में हमारे पास काम बहुत ज़्यादा है — या हम बस परेशान हैं?
इंसान अक्सर एक ही बात दोहराता है— “समय ही नहीं है।”लेकिन सवाल यह नहीं कि समय नहीं है,सवाल यह है कि हम किसमें उलझे हुए हैं? हम बिज़ी रहते हैं…पर किसी से ढंग से बात नहीं कर पाते।काम करते हैं…पर संतोष नहीं मिलता।दिन निकल जाता है…पर लगता है जैसे कुछ जिया ही नहीं। तो फिर…
आत्मसंवाद/Inner Dialogue-DAILY
DAY- 16 January 2026 आज खुद से कहा—धीरे चलो, हर जवाब आज ज़रूरी नहीं। -Rakesh Karwasra